Kya tumhe sach me yaad nahi

मेरे ख्वाबों में आते थे
नींदें मेरी चुराते थे
मिलने को हर इक पल
बेचैन से तुम रहते थे
क्या तुम्हें सच मे याद नही
तेरी हर धड़कन में
मेरा ही बसेरा था
मेरी साँसे तुम तक थी
जीवन मे नया सवेरा था
धूप खिली थी जो आंगन मे
फूल खिले थी जो मन मंदिर में
साथ तुम्हारे हर इक पौधा
रोपा था जो क्यारी में
बन के बैठा है पेड़ बड़ा वो
क्या तुम्हें सच मे याद नही••••

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